राइजिंग राजस्थान सबसे बड़ा फ्रॉड हुआ?

राजस्थान की भाजपा वाली भजन लाल शर्मा सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले साल में ही राइजिंग राजस्थान के नाम से अब तक का सबसे बड़ा निवेश समिट करके खूब वाहवाही लूटी। सरकारी दावे के अनुसार इस समिट में देश और विदेश से 35 लाख करोड़ के एमओयू प्रस्ताव साइन हुए। याद रखना, एमओयू प्रस्ताव साइन हुए थे, निवेश आया नहीं था। 

इसे लेकर कुछ स्वतंत्र पत्रकारों ने तभी सवाल उठा दिए थे, जिसका परिणाम झूठे मुकदमे करके जेल में डालने जैसे काम भी किये गये। राइजिंग राजस्थान के एमओयू पर विपक्ष ने भी सवाल उठाये, लेकिन सरकार गाल बजाती रही कि पहली बार इतना बड़ा काम हुआ, जो कभी नहीं हुआ। सबसे बड़ा निवेश मेला बोलकर देश के प्रधानमंत्री तक को बुलाया गया। 

पिछले दिनों संसदीय कार्यमंत्री जोगाराम पटेल ने दावा किया कि महज तीन महीने में ही 24 लाख करोड़ के एमओयू प्रस्ताव जमीन पर उतार दिये गये हैं, तो खुद सीएम भजन लाल ने पिछले दिनों भाजपा के जिलाध्यक्षों और मंडल अध्यक्षों के कार्यक्रम में कहा कि तीन महीने में 3 लाख करोड़ को जमीन पर उतार दिया गया है। 

अब वही भजन लाल शर्मा कहते हैं कि एमओयू करने वाले इन्वेस्टर उनके फोन नहीं उठा रहे हैं, ईमेल किया गया है, लेकिन ईमेल का भी जवाब नहीं दे रहे हैं। सीएम के इस बयान से आप समझ लीजिए कि जब एक लाख की रुपये की औकात वाला कारोबारी यदि सरकार के साथ 100 करोड़ का एमओयू प्रस्ताव पर साइन करेगा, तो फोन क्यों उठायेगा? 

इस इंवेस्ट समिट पर स्वतंत्र पत्रकारों ने इसी तरह के तमाम सवाल उठाए, जिसका परिणाम यह हुआ कि पत्रकारों को झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल में डाल दिया गया। किंतु अब परोक्ष रूप से वही बात खुद सीएम भजन लाल शर्मा भी स्वीकार कर रहे हैं कि एमओयू करने वाले लोग झूठे थे। आपको पता है ऐसे लोग एमओयू क्यों करते हैं? एक लाख के सालाना टर्न ओवर वाली कंपनी सरकार के साथ 100 करोड़ का एमओयू करके बड़े निवेशकों को आकर्षित करती है, बैंकों से लोन लेने का रास्ता बनाती है और क्राउड फंडिंग जैसे काम करती हैं। 

सीएम और सरकार के साथ एमओयू की फोटो दिखाकर बाजार से पैसा उठाती हैं और पैसा जुटाकर फरार हो जाती हैं। इस सरकार ने जो एमओयू किये, वो किसी स्टांप पेपर पर नहीं किये, जिससे ऐसे लोगों के ऊपर भविष्य में कानूनी कार्यवाही की जा सके। सरकार ने एमओयू के लिए एक साधारण फार्म भरा। 

अब आप सोचिये, जब एमओयू करने वाले की कोई जिम्मेदारी ही तय नहीं की गई, जब संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं है, जब इस पूरे प्रकरण में जिम्मेदारों की जिम्मेदारी ही तय नहीं है तो फिर फ्रॉड होने से कौन रोक सकता है। पहले वसुंधरा—गहलोत की सरकारों ने भी 100 फीसदी एमओयू जमीन पर नहीं उतारे और 35 लाख करोड़ का ढिंढोरा पीटने वाली ये सरकार तो और भी बुरी तरह से मात खाने वाली है। अभी तो निवेशकों के सामने मुख्यमंत्री ने लाचारी दिखाई है, यदि केंद्र की मोदी सरकार ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो पूरी सरकार की बहुत बुरी किरकिरी होने वाली है, जो 2028 में रिजल्ट के तौर पर सामने आयेगी।

पिछले दिनों विधानसभा के बजट सत्र में सरकार पर ​हमला बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने दावा किया था कि जिस कंपनी का टोटल टर्न ओवर ही 100 करोड़ का है, उसके साथ एक लाख करोड़ के एमओयू साइन कर लिये। जिन होटलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और इंडस्ट्रीज का काम पूरा हो चुका है, उनके भी एमओयू हो गये। इससे पता चलता है कि केवल संख्या बढ़ाने का काम किया गया है।

आप कल्पना कीजिये कि जिस कंपनी के पास सबकुछ लोन के हैं, वो भी सरकार के साथ लाखों, करोड़ों के एमओयू कर गई और सरकार अपनी कामयाबी का ढिंढोरा पीट रही है। आज की तारीख में सरकार के पास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जो विपक्ष के इन सवालों के जवाब दे सके।

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