लंबे समय तक मुख्यधारा की राजनीति करने के बाद भी जननेता नहीं बनने की पीड़ा किसी भी नेता के लिए बहुत भारी होती है और उम्र के साथ यह पीड़ा बीमारी में तब्दील हो जाती है। जब ऐसे बीमार व्यक्ति के हाथ में सरकारी खजाने का अथाह धन हाथ लग जाए तो फिर उसको लुटाना तय है।
अशोक गहलोत तीन बार सीएम रहे हैं, लेकिन चौथी बार सीएम नहीं बन पाये। लगातार सीएम बनने का सपना लिये गहलोत ने डिजाइन बॉक्स के सहारे सरकारी खजाने में से करोड़ों रुपये विज्ञापन में झोंक दिये, लेकिन फिर भी सत्ता बरकरार नहीं रख पाये। तीसरे टर्म में सचिन पायलट की बगावत के बाद गहलोत ने अपने आलाकमान तक से पंगा ले लिया था।
गहलोत ने 25 सितंबर 2022 को अपने भविष्य की सोचे बिना कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिया गांधी तक से बगावत करने जैसा कदम उठा दिया था। इस तरह देखें तो पायलट को सीएम की कुर्सी से दूर रखने के लिए गहलोत ने अपने करियर तक को दांव पर लगा दिया था। पायलट की सबसे बड़ी ताकत है उनके साथ जन सैलाब, लेकिन बंद कमरों की रणनीति में पायलट मात खा गये, जिसे दूर करने के लिए पायलट ने भी कमर कस ली है तो दूसरी तरफ जन सैलाब ही गहलोत की कमजोरी है।
गहलोत बंद कमरे के भीतर 24 घंटे राजनीति कर सकते हैं, लेकिन मैदान में उतरकर भारी भीड़ जुटाने की क्षमता उनमें नहीं है। गहलोत ने एक बार पायलट को अच्छी ड्रेसअप सेंस वाला, अच्छा बोलने वाला और गुड लुकिंग बोलकर अपनी कमजोरी तक जाहिर कर दी थी। जनता की भारी भीड़ अपने दम पर जुटाने की क्षमता रखने वाला नेता ही जननेता होता है।
गहलोत के समर्थक उनको जननेता और जननायक कहते तो हैं, लेकिन हकीकत में वो हैं नहीं। अब गहलोत ने अपनी इसी कमजोरी को दूर कर चौथी बार सीएम बनने का मन बना लिया है। राजस्थान के विधानसभा चुनाव में अभी भी साढ़े तीन साल से अधिक बाकी हैं, लेकिन गहलोत अपनी चौथी पारी खेलने के लिए मैदान में उतर चुके हैं।
जिस मजबूती पर सवार होकर पायलट सीएम पद पर दावा ठोकते हैं, अब गहलोत भी वही मजबूती, यानी जनता की भीड़ा को दिखाने का जादू हासिल करने का प्लान बना रहे हैं। इसी शुरुआत पायलट के गढ़, यानी दौसा से कर दी है, जहां शुक्रवार को आगरा रोड़ पर जगह जगह भीड़ से पायलट स्टाइल में स्वागत करवाकर फोटो—वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करवाये हैं।
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