राजस्थान की राजनीति में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की प्रतिद्वंद्विता किसी छिपी हुई बात नहीं है। दोनों नेताओं के बीच कई वर्षों से सत्ता के लिए संघर्ष चल रहा है। यह संघर्ष न केवल व्यक्तिगत है, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक भी है। अशोक गहलोत राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, एक अनुभवी राजनेता हैं।
उनकी कांग्रेस में आलाकमान तक गहरी पैठ है और वे एक कुशल प्रशासक माने जाते हैं। हालांकि, 25 सितंबर 2022 की बगावत के बाद आलाकमान और गहलोत के बीच दूरी मानी जा रही है। दूसरी ओर सचिन पायलट एक युवा और ऊर्जावान नेता हैं, जिनकी युवाओं में अच्छी लोकप्रियता है। वे बदलाव और प्रगति के प्रतीक माने जाते हैं।
दोनों नेताओं के बीच सबसे बड़ा विवाद मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर है। साल 2018 में कांग्रेस की जीत के बाद पायलट ने उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, लेकिन उनकी नजर मुख्यमंत्री पद पर थी। इसके चलते केवल डेढ़ साल बाद 11 जुलाई 2020 को उन्होंने गहलोत सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया, जिससे राज्य में राजनीतिक संकट पैदा हो गया।
हालांकि, कांग्रेस आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद स्थिति को शांत कर दिया गया, लेकिन दोनों नेताओं के बीच तनाव अभी भी बना हुआ है। दोनों नेताओं के बीच की प्रतिद्वंद्विता का राज्य की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इसने कांग्रेस पार्टी को विभाजित कर दिया। इससे कांग्रेस को चाहने वाली जनता के बीच भ्रम और अनिश्चितता पैदा कर दी है।
अशोक गहलोत राजस्थान में काफी लोकप्रिय नेता हैं। गहलोत की कांग्रेस आलाकमान तक गहरी पैठ है। उनकी तीसरे टर्म वाली सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं और गरीबों के प्रति सहानुभूति ने उन्हें एक मजबूत जन समर्थन माना जाता है। इसी का परिणाम रहा है कि उनकी लीडरशिप में कांग्रेस 2013 में 21 सीटों पर सिमट गई थी, लेकिन 2023 में सत्ता से बेदखल होने के बाद भी 70 सीटों को जीतने में कामयाब रही।
सचिन पायलट युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। उनकी ऊर्जा और प्रगतिशील विचारों ने उन्हें एक युवा और गतिशील नेता के रूप में स्थापित किया है। शहरों और गांवों में पायलट की समान लोकप्रियता है। कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट में ही प्रदेश कांग्रेस का भविष्य देखते हैं। यही कारण है कि चंद नेताओं को छोड़ दिया जाए तो तमाम कांग्रेसी युवा नेता सचिन पायलट के खास बने रहना चाहते हैं।
दोनों नेताओं की जनता के बीच अलग-अलग स्वीकार्यता है। गहलोत को एक अनुभवी और विश्वसनीय नेता के रूप में देखा जाता है, जबकि पायलट को एक युवा और आशाजनक नेता के रूप में देखा जाता है। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की प्रतिद्वंद्विता राजस्थान की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है। अशोक गहलोत 1980 से राजनीति में हैं।
गहलोत अब तक एक विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव हारे हैं, जबकि प्रदेश के तीन बार सीएम रहे हैं। उससे पहले केंद्रीय मंत्री तक रहे हैं। तीन बार सीएम रहने के बाद भी यदि कोई नेता भीड़ नहीं खींच सकता तो स्वत: जनता में गलत संदेश जाता है। कांग्रेस आलाकमान के साथ तालमेल अच्छा होने के कारण गहलोत तीन बार सीएम तो बन गये, किंतु जब आम सभा करने की बारी आती है तो उनके नाम से जनता को बुलाना बेहद कठिन हो जाता है।
यही वजह है कि सत्ता में रहते उनके द्वारा किये जाने वाले तमाम कार्यों के बाद भी 2003, 2013 और 2023 में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई। 2013 के चुनाव में तो कांग्रेस को इतिहास की सबसे बुरी हार गहलोत के सीएम रहते ही मिली थी।
इस बात पर विचार भिन्न हो सकते हैं कि जीत किसके दम पर मिलती है और सीएम कौन बनता है, लेकिन इस बात से सभी सहमत हैं कि अशोक गहलोत से बड़ा चतुर राजनेता आज कांग्रेस में दूसरा कोई नहीं है। खासकर राजस्थान में तो उनकी चालों का किसी के पास जवाब नहीं है।
2018 में कांग्रेस की जीत के बाद सत्ता में आने से पहले आमजन में यह धारणा थी कि गहलोत एक मंजे हुए नेता ही नहीं हैं, बल्कि पूरी तरह से परिपक्व भी हैं और पत्रकारों के साथ उनके रिश्ते बेहद खास हैं। किंतु अपने अंतिम कार्यकाल में दोनों ही भ्रम तब टूट गये, जब उन्होंने अपनी ही पार्टी के अध्यक्ष सचिन पायलट को नाकारा, निकम्मा जैसे शब्दों से नवाजा।
साथ ही सरकार की आलोचना करने वाले मीडिया संस्थानों और पत्रकारों के खिलाफ दुश्मन की भावना से काम किया गया। एक तरफ गहलोत जहां रणनीति के मास्टर हैं, तो पायलट युवाओं के चहेते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि युवा ही चुनाव की दिशा तय करते हैं। युवाओं के कहने पर ही परिवार के लोग वोट करते हैं और युवा ही तय करते हैं कि उनके परिजन किस दल को, किस नेता को वोट देंगे।
इस लिहाज से पायलट आज की तारीख में गहलोत से भारी पड़ते हैं। किंतु जब बंद कमरों में सरकार बनाने या बचाने की रणनीति की बारी आती है तो पायलट कमजोर साबित होते हैं और गहलोत बाजी मार लेते हैं। जब जनवरी 2014 में पायलट को पीसीसी चीफ बनाकर राजस्थान भेजा गया था, तब से लेकर अब तक उनकी स्वागत-सस्कार के नाम पर ताकत दिखाने के लिए भीड़ जुटाने की रणनीति का हर कोई मुरीद है। इसी के दम पर 2018 में कांग्रेस के प्रति माहौल बना और इसी के दम पर बगावत करने के बाद भी कांग्रेस उनपर आज तक कार्यवाही नहीं कर पाई।
इस योजना को अब तक अशोक गहलोत दरकिनार कर रहे थे, लेकिन जब से रणनीतिक नेता गहलोत की अपने ही आलाकमान के साथ पटरी नहीं बैठ रही है, तब से उन्होंने भी नीति में बदलाव किया है। डिजाइन बॉक्स के सहारे सत्ता रिपीट तो नहीं करा पाये, लेकिन अब एक नये रणनीतिकार के सहारे अशोक गहलोत ने भी सचिन पायलट बनने का फैसला किया है।
जिस तरह से प्रदेश के दौरों पर जाने के दौरान सचिन पायलट अपने समर्थकों की भीड़ जुटाकर फोटो और वीडियो वायरल करते हैं, करवाते हैं, ठीक उसी तरह से अब अशोक गहलोत ने भी काम शुरू कर दिया है। शुरुआत दौसा से की है, जो पायलट परिवार का गढ़ रहा है।
अपने पहले प्रयास में गहलोत और उनके रणनीतिकार काफी हद तक सफल भी हुए हैं और संभावना पूरी है कि आने वाले समय में यह प्रतिस्पर्धा बढ़ने वाली है। यह समय तय करेगा कि पायलट की रणनीति को अपनाकर गहलोत कितने कामयाब होते हैं और गहलोत की चालों को अपनाकर पायलट कितने सफल होंगे, लेकिन इतना पक्का हो चुका है कि अशोक गहलोत ने 2028 की तैयारी शुरू कर दी है, जिससे निपटने के लिए सचिन पायलट को अपनी नीति, व्यवहार, समर्थक युवा नेताओं की सोच और कांग्रेस आलाकमान तक पहुंच बढ़ाने पर अथक प्रयास करने होंगे।
मान लीजिये अशोक गहलोत अपनी इस रणनीति में कामयाब होते हैं और उनको मात देने के लिए सचिन पायलट पहले से ज्यादा ताकत लगाते हैं, तो आने वाले समय में प्रदेश की जनता को एक नई सियासी प्रतियोगिता के दर्शन होंगे, जो निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए फायदेमंद होगी। भाजपा के रणनीतिकार पक्के तौर पर कांग्रेस नेताओं की इस जुगलबंदी को बारीकी से निहार रहे होंगे!
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