राजस्थान में बजट सत्र चल रहा है। पहली बार विधायक चुनकर सीएम बने भजन लाल शर्मा विधानसभा के नेता हैं, जबकि पिछली सरकार में मंत्री रहने के बाद नेता प्रतिपक्ष के पद पर पहुंचे टीकाराम जूली अपनी ही पार्टी में अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा सरीखे नेताओं के बीच कद तलाशने का प्रयास कर रहे हैं। टीकाराम जूली को दूसरी बार सदन में चुनकर आने का अनुभव है, तो भजन लाल पहली बार सदन में आए हैं। भजन लाल शर्मा के मंत्रिमंडल में भी अनुभवहीन मंत्रियों की भरमार है। दो—तीन मंत्री को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश पहली बार मंत्री बने हैं। पुरानों में भी गजेंद्र सिंह खींवसर जैसे मंत्री इतने कमजोर हैं कि ठीक से विपक्ष के सवालों के जवाब तक नहीं दे पाते हैं।
विधायक मनीष यादव के सवाल पर खींवसर का 'अभी सरकार को साढ़े तीन साल पड़े हैं, पांच किलो घी की योजना को लागू कर देंगे' वाला बयान सरकार की फजीती कराने के लिए काफी है। कैबिनेट मंत्री और संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल पहले विधायक रह चुके हैं, लेकिन सदन के पटल पर वो काफी कमजोर साबित हो रहे हैं। प्रेमचंद बैरवा और दीया कुमारी पहली बार मंत्री बने हैं, जिनमें अनुभवहीनता स्पष्ट दिखाई देती है। सदन में पहली पंक्ति में बैठने वाले मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ अपनी धुन में रहते हैं, वो अपने विभाग के अलावा किसी में नहीं बोलते। मदन दिलावर को उनके बयानों के कारण विपक्ष और मीडिया के द्वारा विवादित मंत्री बनाया जा चुका है, तो बाबूलाल खराड़ी सीधे—साधे नेता हैं। यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा कम बोलते हैं, हां, हूं में जवाब देकर निपटा देने का प्रयास करते हैं।
ऐसे लगता है जैसे बोलने की कंजूसी से ही काम चल जाएगा। जेजेएम को लेकर पिछली सरकार में सबसे विवादित रहे जलदाय विभाग के मंत्री कन्हैया लाल चौधरी के साथ अच्छी बात यह है कि खुद ठेकेदारी करते हुए यहां तक पहुंचे हैं। इसका फायदा भी है और एक नुकसान भी हो सकता है। उनको ए टू जेड नॉलेज है, जो काम में गति लाने के लिए फायदेमंद है। दूसरी तरफ यही बात नकारात्मक भी है। यदि उनको पूरी जानकारी है तो विभाग में होने वाले भ्रष्टाचार के रास्ते भी अच्छे से पता हैं। यदि नेगेटिव रहे तो विभाग में जमकर भ्रष्टाचार हो सकता है, और पॉजिटिव रहे तो विभाग पर पिछली सरकार में लगे दाग धुल भी जाएंगे। सदन में दूसरी पंक्ति में बैठने वाले अविनाश गहलोत को लगता है उनके अनुभव और उम्र के हिसाब से अधिक मिल गया है, जो संभल नहीं पा रहा है। बजरी खनन पर उनका बयान, उससे पहले दादी वाला बयान उनकी अपरिपक्वता को साबित करने के लिए काफी है।
उनके विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी उनकी खूब चर्चा करते हैं। खाद्य मंत्री सुमित गोदारा बहुत बुद्धिजीवी मंत्री हैं, लेकिन सरकार उनका उपयोग ठीक से नहीं कर पा रही है। गुरुवार को नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और डिप्टी सीएम दीया कुमारी के बीच हुई बहस ने साबित कर दिया कि डिप्टी सीएम बिलकुल भी परिपक्व नहीं हैं। छोटी सी बात पर अपना आपा खो देना दिखाता है कि मंत्रियों का अपने विभाग वाले अधिकारियों के साथ संपर्क साधारण नहीं है। सरकार में तीन मंत्री तो ऐसे हैं, जिनकी स्टाइल देखकर लगता है जैसे ये लोग सीएम से, सरकार से, संविधान से और लोकतंत्र से भी ऊपर बैठै हैं। सरकार के मंत्री साधारण बर्ताव वाले नहीं होंगे, जब तक उनकी विपक्ष के नेताओं को कम शब्दों में तार्किक जवाब देने की क्षमता नहीं होगी, तब तक सरकार की सदन में किरकिरी होती रहेगी।
कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी से नाराज हैं। उन्होंने एक तरह से विधानसभा का बहिष्कार ही कर दिया है, जिसके कारण टीकाराम जूली पर बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है। देवनानी का बर्ताव देखकर लगता है जैसे वो सदन में पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर आते हैं। कभी तो विपक्ष के साथ उनका व्यवहार बेहद घरेलू होता है, जबकि कभी बिना वजह ही उखड़ जाते हैं। खींवसर विधायक रेवंतराम डांगा की 'राम—राम' करना ही देवनानी को रास नहीं आया। कभी विपक्षी विधायक जब उनकी तरफ कागज फेंकते हैं तो वो बिदक जाते हैं और जब खुद कागज फाड़कर फेंकते हैं, तो सवाल उठने लाजमी ही हैं।
सीएम भजन लाल शर्मा की अनुभवहीनता उनके मंत्रियों पर दिखाई दे रही है। सीएमओ के अधिकारियों की टीम को इसका पूरा ध्यान रखना चाहिए और समय—समय पर इसका विश्लेषण करके फीडबैक जैसा सिस्टम इजाद करना चाहिए, ताकि सरकार के लिए, सीएम के लिए जनता में जा रही नकारात्मकता 'साढ़े तीन' साल बाद बहुत भारी नहीं पड़े। वर्तमान में सरकार की जो स्थिति दिखाई दे रही है, उसका पार्टी 'राष्ट्रीय स्तर' पर अपने स्तर पर मूल्यांकन कर ही रही होगी, यदि नहीं कर रही है तो फिर 2028 का चुनाव एक बार फिर से सत्ता परिवर्तन की चाहत को पूरी करने वाला साबित होगा।
पेपर लीक को लेकर 50 से ज्यादा ट्रेनी एसआई और संबंधितों को पकड़ा गया है। यह पहला अवसर है, जब इतने बड़े पैमाने पर पेपर चोर पकड़े गये हैं, लेकिन इसी से सवाल भी उठ रहे हैं कि जब इतने बड़े स्तर पर पेपर लीक हुआ है तो फिर एसआई भर्ती परीक्षा रद्द क्यों नहीं हो रही है? पेपर लीक मामले पर सरकार ने एसआईटी गठन कर जो वाहवाही लूटी थी, अब वो उल्टी पड़ती नजर आ रही है। इस मामले में सरकार का पक्ष रखने वाला कोई नहीं है, जिससे जनता में बन रहा नैरेटिव रोका जा सके। सीएम को लेकर जो परसेप्शन पहले बना है, उसे ही मजबूत करने का काम विपक्ष द्वारा बखूबी किया जा रहा है। विपक्ष हालांकि खुद धड़ों में बंटा हुआ है, लेकिन जब सरकार में कमजोरियों की भरमार हो, तो फिर विपक्ष का काम आसान हो जाता है।
विपक्ष यदि एकजुट होकर सरकार पर हमला करे तो आज की सरकार के लिए टिक पाना कठिन जा जाए, लेकिन ऐसे लगता है कि विपक्ष ने भी पेपर लीक वाले मामले के कारण सरकार के साथ तालमेल बिठाकर चलने का मन बना लिया है। पिछली सरकार के शिक्षा मंत्री रहे डोटासरा को लेकर विपक्ष में होते भाजपा नेताओं ने जो कुछ बोला था, उसका एक फीसदी काम भी नहीं किया गया। डोटासरा सत्ता में रहते सीना ठोककर बोलते थे कि 'जिसको नौकरी लगा दिया, तो लगा दिया, छाती ठोककर लगा दिया, जिसे जो करना है कर ले।'
इस तरह के बयान के बाद भाजपा के नेता बोलते थे कि जब हमारी सरकार आएगी तो पेपर लीक के मगरमच्छ पकड़ लेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि मगरमच्छ छोड़कर मछलियां भी पकड़ में नहीं आ रही हैं, कुछ मेंढक पकड़कर सीना ठोका जा रहा है। अपने ही मंत्री के इस्तीफे और आरोपों से घिरी सरकार के लिए चुप रहकर काम करना मजबूरी हो गया है। विधानसभा सत्र तक सरकार के मंत्री कुछ हद तक एकजुट दिखाई देने का प्रयास करते हैं, लेकिन जैसे ही सदन स्थगित होता है जो सब अपने महकमे में जुट जाते हैं। सीएम भजन लाल शर्मा के हर महीने दिल्ली दौरे जनता में सवालों का तूफान ला रहे हैं। कुछ मंत्री अपने घरों का दरवाजा लोगों के लिए खुला रखते हैं, जबकि अधिकांश के दरवाजों पर पहरेदार बैठे हैं, जिनको जनता के साथ मंत्री के संबंधों से कोई सरोकार नहीं है। केवल डेढ़ साल पूर्ण नहीं हुआ है, तब ये हालात हैं। सोचिये सरकार के लिए आगे का रास्ता कितना कठिन होगा? चाहे सीएम हो या मंत्री, इमैच्योरिटी खतरनाक होती है।
Post a Comment