राजस्थान में अवैध बजरी खनन 8 साल से बदस्तूर जारी है। इलिगल माइनिंग को लेकर राजस्थान के नेता गाल बजाने का काम तो खूब करते हैं, लेकिन इससे निपटने के लिए अभी ठोस काम नहीं किया गया है। अवैध बजरी खनन की सीबीआई जांच से इनकार करने के बाद एक बार फिर से विवाद उठा है, जो सदन से सड़क तक नेताओं की जुबान पर है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बीसलपुर में गाद निकालने के नाम पर हो रहे अवैध बजरी खनन पर रोक लगा दी है, लेकिन इसके बावजूद गाद निकालने का काम बदस्तूर जारी है। बीसलपुर में गाद निकालने के नाम पर 20 हजार करोड़ का घोटाला बताया जा रहा है, जिसमें राज्य के दोनों ही प्रमुख दलों के आधा दर्जन बड़े नेताओं का गठजोड़ है। इसके बारे में विस्तार से फिर कभी बात करेंगे।
वीडियो देखने के लिए यहां पर क्लिक करें
पिछले दिनों कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने कहा था कि सवाई माधोपुर में प्रतिदिन 7 करोड़ की अवैध बजरी खनन किया जा रहा है। कैबिनेट मंत्री अविनाश गहलोत ने पाली में कहा कि पुलिस प्रशासन ट्रैक्टरों पर पेनल्टी ना लगाएं, ये लोग अपने घर के काम के लिए बजरी खनन करते हैं। जब 2018 में अशोक गहलोत तीसरी बार सीएम बने थे, तब उन्होंने विधानसभा के भीतर कहा था कि वसुंधरा राजे सरकार में प्रतिदिन 5 करोड़ रुपये का अवैध बजरी खनन भाजपा नेताओं की जेब गर्म कर रहा है।
राजस्थान में बजरी खनन का मामला तब सुर्खियों में आया था, तब 16 नवंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बजरी खनन पर रोक लगा दी थी। तब करीब 45 खदानों में लीज के द्वारा वैध खनन हो रहा था। इन खानों में पुनर्भरण अध्ययन और पर्यावरण एनओसी के बिना भी खनन हो रहा था, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट ने बजरी खनन पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद 11 नवंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने रोक हटा दी, लेकिन उसके करीब चार साल पूरे होने के बाद भी राज्य सरकार लीगल माइनिंग नहीं करवा पा रही है। पिछली सरकार ने बजट घोषणा में 100 हेक्टैयर तक के पट्टों की निलामी की योजना बनाई थी, जिसपर भाजपा सरकार आते ही पहले महीने में ही रोक लगा दी थी, किंतु करीब 6 महीने बाद सरकार ने उसी सिस्टम से निलामी प्रक्रिया शुरू कर दी।
परिणाम यह हो रहा है कि एक तरफ जहां उपभोक्ता को लूटा जा रहा है, तो रवन्ना नहीं कटने के कारण राज्य सरकार के खाते में रेवेन्यू नहीं आ रहा है और इस अवैध खनन के खेल में वर्चस्व की लडाई गैंगवार में तब्दील हो रही है। ऊपर से अवैध खनन के कारण अवैध लोडिंग हो रही है, दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि बजरी माफिया ने राजस्थान की राजनीति, ब्यूरोक्रेसी और पूरे सिस्टम को अपनी मुट्ठी में कर लिया है।
राजस्थान में आज वैध रूप से बिक रही बजरी का बाजार भाव करीब 1200 से 1300 प्रति टन है, जबकि इलीगल बजरी करीब 1000 टन में बिक रही है। लीगल बजरी ट्रक में करीब 40 टन होती है, जिसमें 650 रुपया प्रति टन भराई है। उसके बाद ट्रक का किराया, मजदूरी, टोल टैक्स मिलाकर 12 हजार रुपये में बेची जाती है।
जहां बजरी की लीज है, उसके आसपास करीब 50 किलोमीटर तक लीजधारक अवैध बजरी खनन रोकने के लिए पुलिस, प्रशासन की मदद लेता है, जिससे अवैध खनन पर अंकुश लग सके। यदि पुलिस और प्रशासन मदद नहीं करता है तो लीज धारक को कोई खास बचत नहीं होती है।
लीज धारक के बजरी खनन पर पुलिस और प्रशासन की तीखी नजर रहती है, जबकि अवैध बजरी तस्करों के सैकड़ों ओवर लोडेड ट्रक देखकर भी पुलिस आंखें बंद कर लेती है। कितनी मजेदार बात है कि लीज धारक को पुलिस से मदद के लिए गिडगिड़ाना पड़ता है, जबकि बजरी तस्करों को पुलिस की गाड़ियां प्रोटॉकोल देती नजर आती हैं।
इलिगल माइनिंग में सबसे अधिक भूमिका लोकल पॉलिटिशियंस की होती है। इसके अलावा पुलिस और आरटीओ की नियमित बंधी होने के कारण तस्करों को मदद मिल जाती है। कुछ जगह पर खनन विभाग के अधिकारी भी बंधी लेकर तस्करों को सहयोग करते हैं।
सामान्यत: अवैध बजरी खनन में ट्रक सीधे नदी उतरकर नहीं भरे जाते हैं, बल्कि ट्रैक्टर्स से किसी एक जगह पर बजरी एकत्रित की जाती है। ट्रैक्टरों की चैकिंग होती है तो घर के काम के लिए बोलकर ले जाते हैं। इन ट्रैक्टरों से अवैध बजरी का स्टॉक हाइवे किनारे ढाबों के पास, सड़क के पास पेड़ों के झुरमुट में और निजी चारदीवारी में किया जाता है, जहां से रात को डंपर भरे जाते हैं।
टोंक और सवाई माधोपुर में लगभग इसी तरह से अवैध खनन होता है, जबकि नागौर में तो नदी में उतरकर डम्पर भरे जाते हैं। डेगाना से भाजपा विधायक अजय सिंह किलक ने पिछले दिनों विधानसभा में कहा था कि नागौर एसपी नारायण टोगस उनका कहना नहीं मानते हैं।
सूत्र बताते हैं कि नागौर में अजय सिंह किलक की बजरी खनन में चलत नहीं है, जबकि स्थानीय सांसद हनुमान बेनीवाल के साथ उनकी जंग चल रही है। मजेदार बात यह है कि कांग्रेस के विधायक रहे विजयपाल मिर्धा का आज भी क्षेत्र में सिक्का चलता है, जो भाजपा में शामिल हो चुके हैं
2017 में जब बजरी खनन पर रोक लगी थी, तब प्रदेश में 45 लीज थीं, लेकिन 2021 में रोक हटने के बाद भी सभी लीज फिर से चालू नहीं हो पाई है। बजरी कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं कि लीज धारक अवैध बजरी खनन के चलते मुनाफे में नहीं आता है, जिसके कारण कोई लीगल लीज चालू करना ही नहीं चाहता है।
वर्तमान में टोडारायसिंह, आसींद, राश्मी, खेतड़ी, पीसांगन, अजमेर में लीज से बजरी खनन हो रहा है। वैसे तो जैतारण और कैकड़ी में भी लीज हैं, लेकिन यहां पर स्थानीय विधायकों के दखल के कारण लीज धारक को मुनाफा नहीं हो रहा है। राज्य में सबसे अच्छी बजरी टोंक में बनास नदी की की मानी जाती है, यह बजरी उनियारा और कैकड़ी से निकाली जाती है।
पाली के जैतारण से अविनाश गहलोत भाजपा विधायक हैं, जो वर्तमान में राजस्थान सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के कैबिनेट मंत्री हैं। पिछले दिनों पुलिस के सामने गहलोत ने कहा था कि जो ट्रैक्टर से बजरी ले जाते हैं, उनको पेनल्टी नहीं लगाई जाए, वो अपने घर के लिए काम लेते हैं।
ऐसा बोलकर एक तरह से गहलोत ने अवैध बजरी खनन की वकालत की थी। कैकड़ी और सावर में स्थानीय विधायक ही अड़ंगा लगा रहे हैं। ये नेता अपने लोगों को काम पर रखने और उनकी गाड़ियां फ्री भरने की जिद करते हैं। जिसके कारण लीज धारक को नुकसान होता है। इन क्षेत्रों में बजरी तस्करी खूब हो रही है।
16 दिसंबर 2017 सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्भरण का अध्ययन करने और बेलगाम खनन को लेकर रोक लगाई थी। कोर्ट ने डीएसआर, यानी डिस्ट्रिक्ट सर्वे रिपोर्ट बनवाई, जिसके आधार पर 2021 में खनन पर रोक हटाई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीईसी, यानी केंद्रीय पर्यावरण समिति ने मौका देखकर लीज अनुमति दी थी।
इसमें शर्त रखी गई कि खनन क्षेत्र में सुबह—शाम डोजर चलाना पड़ेगा, पानी का छिड़काव करना पड़ेगा, नदी में उतारकर ट्रक नहीं भरे जाएंगे और बजरी को तोलने के लिए धर्म कांटा खनन क्षेत्र के नजदीक होना चाहिए। सरकार ने अब 100 हेक्टेयर तक की लीज देने का निर्णय लिया है, जिसमें 250 रुपये टन तक ही बेच सकते हैं।
ईसी, यानी पर्यावरण मंजूरी नहीं मिलने के कारण आज भी अधिकांश लीज अटकी पड़ी है। पर्यावरण मंजूरी स्टेट गवर्नमेंट ही देती है, लेकिन इसमें काफी समय लगता है। जानकारों का मानना है कि अवैध खनन में लिप्त स्थानीय राजनेता सरकार को पर्यावरण मंजूरी देने ही नहीं देते, जिससे उनका काला कारोबार चलता रहता है।
राजस्थान में अवैध बजरी खनन में लाखों लोग लिप्त हैं, हजारों की संख्या में ट्रक और ट्रैक्टर दिनरात बजरी तस्करी कर रहे हैं। अकेले जयपुर में प्रतिदिन 1500 से 2000 ट्रक टोंक—सवाईमाधोपुर सप्लाई करते हैं। इनमें से आधे ट्रक अवैध बजरी के होते हैं। टोंक से जयपुर और सवाई माधोपुर से जयपुर हाईवे पर करीब 4 से 5 पॉइंट पड़ते हैं, जहां उनसे वसूली की जाती है।
हर पॉइंट पर ट्रक के हिसाब से 8000 से 10000 रुपये वसूले जाते हैं। लीज धारक जहां 40 टन का ट्रक भर सकता है, जबकि अवैध बजरी खनन करने वाले 80 से 90 टन का ट्रक भरकर बेचते हैं। नेताओं, पुलिस और आरटीओ को देने के बाद भी बजरी तस्कर एक ट्रक पर आराम से 50 से 60 हजार रुपये कमाते हैं, जबकि लीज धारक को 10 हजार तक बचाना भी मुश्किल होता है।
पहले निजी खातेदारों की भी लीज होती थी, जिनके खेत नदी किनारे हैं। किंतु खातेदार अपने खेत से बजरी खोदने के बजाए नदी से बेचते थे, इसके कारण सुप्रीम कोर्ट ने इसपर रोक लगा दी। अब निजी खातेदारों की नदी क्षेत्र के 5 किलोमीटर तक लीज बंद है। हालांकि, नागौर के कुचेरा में लुप्त सरस्वती नदी के कारण निजी खातेदारी में वैध लीज है।
वैसे तो नियमानुसार स्थानीय पुलिस और प्रशासन को लीज धारक की सुरक्षा और अवैध बजरी खनन को रोकने के लिए काम करना चाहिए, लेकिन अवैध खनन वालों के साथ पुलिस के गठजोड़ के कारण लीज धारकों को मदद नहीं मिलती है।
इसके चलते 9 अप्रैल 2024 को राज्य के 8 लीज धारकों ने अपनी लीज सरेंडर कर दी, जो दिसंबर 2027 तक थी। अवैध बजरी जहां बेरोकटोक बिक रही है, वहीं लीज धारकों को छोटी सी गलती पर 10 गुणा तक पेनल्टी लगातार परेशान किया जाता है।
-लोकल नेताओं की दादागिरी, पुलिस-प्रशासन का असहयोग, खान में उत्तम माल की कमी, तस्करों द्वारा धमकाने के कारण अजमेर, चित्तौड़गढ़, नसीराबाद, किशनगढ़, दौसा, परबतसर, चौहटन और जोधपुर में एक-एक लीज सरेंडर कर दी गई है।
सरकार लीगल बजरी खनन का दावा करती है, जबकि कांग्रेस नेता इस सारा दोष वर्तमान सरकार पर लगाकर पल्ला झाड़ने का विफल प्रयास करते हैं। साल 2017 से 2021 तक हजारों करोड़ रुपये का अवैध बजरी खनन हुआ, जिसके चलते बजरी तस्करी में लिप्त अपराधियों ने जमकर चांदी कूटी। तस्करी रोकने का प्रयास करने वाले सैकड़ों लोगों की ट्रकों और ट्रैक्टरों से कुचलकर हत्या कर दी गई।
भले ही बजरी खनन की अनुमति मिल गई हो, लेकिन बजरी तस्करों का लालच अब इस कदर बढ़ गया है कि पुलिस, आरटीओ और खनन विभाग के अधिकारियों को डंपर से कुचलकर मारने से भी नहीं चूकते हैं। हाल ही में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि स्थानीय पुलिस का सहयोग नहीं मिलने के कारण बजरी तस्करी की जांच नहीं की जा सकती है।
इसका अर्थ यह हुआ कि स्थानीय पुलिस भी अवैध बजरी तस्करी में लिप्त है, जो सीबीआई जांच नहीं चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई करते हुए सीबीआई से कहा है कि चाहे सीआरपीएफ की मदद लें या पड़ोसी राज्यों, लेकिन अवैध बजरी तस्करी की सीबीआई जांच करनी होगी। उम्मीद है कि अब सीबीआई जांच करेगी और असली आरोपी जेल की सलाखों के पीछे होंगे।
Post a Comment